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मनोज्ञान – ‘जब तक कोई जिम्मेदारी नहीं ले लेता है, तब तक वह सही मायने में सीख नहीं पाता है!’ केके

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गुरु स्वामी रामदास पीड़ा से कराह रहे थे। उनके शिष्य, जिनमें महाराज शिवाजी भी थे, उपचार में लगे थे। सहसा गुरु बोल उठे, “ओह! पेट में भीषण पीड़ा हो रही है। यह पीड़ा कहीं जीवन का अंत ही न कर दे।” गुरु की बात सुनकर शिवाजी ने कहा, “ऐसा क्यों कहते हैं, गुरुजी! क्या ऐसी कोई औषधि नहीं जिससे आपकी पीड़ा शांत हो सके।” गुरुजी बोले, “औषधि तो है शिवा, किंतु उसका लाना बड़ा दुष्कर है।” शिवाजी ने कहा, “औषधि का नाम तो बताइए गुरुजी।” गुरु ने शिवा की ओर देखा और बोले, “तुम औषधि ला सकोगे, शिवा ? बाघिन के दूध से मेरा कष्ट दूर होगा।” सबके चेहरों पर मौन छा गया। शिवाजी ने कहा, “मैं बाघिन का दूध लाऊंगा, मुझे आदेश दीजिए।” गुरुजी बोले, “किंतु शिवा! अंधेरी रात है, ऐसे समय में तुम वन में कैसे जा सकोगे?” शिवाजी ने कहा, “आपके आशीर्वाद की शक्ति से गुरुजी।” “अच्छा, जाओ बेटा, भवानी माता तुम्हारी रक्षा करेंगी।” शिवाजी गुरु के चरणों में प्रणाम कर वन के दुर्गम मार्ग पर चल दिया। वन में पहुंचकर शिवाजी ने घंटों बाघिन की खोज की, किंतु बाघिन कहीं दिखाई न पड़ी। सहसा उन्होंने देखा, एक बाघिन वर्षा से बचने के लिए वृक्ष की ओर चली आ रही है। शिवाजी कुछ सोच ही रहे थे कि बाघिन स्वयं उनके पास आकर खड़ी हो गई। शिवाजी प्रेम से उसकी पीठ पर हाथ फेरकर उसका दूध दुहने लगे। शिवाजी ने दूध लाकर गुरु को दे दिया। गुरु ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया और कहा, “देश को विदेशी शासन से मुक्त कराने की तेरी साधना अवश्य सफल होगी शिवा। इस कहानी में शिवा जी द्वारा ली गयी जिम्मेदारी के भाव ने ही उनमें कार्य के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा कर दी। जबकि इसके उलट जब तक किसी भी व्यक्ति में किसी भी कार्य के प्रति जिम्मेदारी पैदा ना हो तो सीखने का भाव पैदा हो ही नहीं सकता। अतः जब तक कोई जिम्मेदारी नहीं ले लेता है, तब तक वह सही मायने में सीख नहीं पाता है।

केके
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