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मनोज्ञान – ‘मन पर नियंत्रण कर, Man-Parivartan करके, मन को सही दिशा दे, ज़िन्दगी को मोड़ देने वाला मन का ज्ञान ही है ‘मनोज्ञान!’ केके

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‘मन पर नियंत्रण कर, Man-Parivartan करके, मन को सही दिशा दे, ज़िन्दगी को मोड़ देने वाला मन का ज्ञान ही है

“लोग अपनी हालत के लिए अकसर परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराकर उन्हें कोसते रहते हैं। मैं परिस्थितियों की बात पर यकीन नहीं करता। जो लोग इस संसार में आगे बढ़ते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो उठ खड़े होते हैं और उन परिस्थितियों की तलाश करते हैं जैसा वे चाहते हैं और उन्हें वह नहीं मिलती तो वे ख़ुद उसका निर्माण कर लेते हैं।”

प्रसिद्ध नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का ये वाक्य इस बात को साबित करता है कि जीवन की हर एक समस्या को समझने के लिए अगर कुछ चाहिए तो वो है ‘मनोज्ञान’ क्योंकि मन पर नियंत्रण कर Man-Parivartan करके मन को सही दिशा दे ज़िन्दगी को मोड़ देने वाला मन का ज्ञान ही है

‘मनोज्ञान!’ हो सकता है किसी इंसान को मनोविज्ञान नहीं समझ आता हो या मनोविज्ञान से डर लगता हो परन्तु ‘मनोज्ञान’ इतना सहज, सरल, रचनात्मक और रुचिकर है कि भारत का हर एक व्यक्ति, चाहे साक्षर हो या निरक्षर अथवा शिक्षित हो या अशिक्षित, अपने जीवन की हर एक समस्या का रचनात्मक ढ़ंग से सर्वहितकारी समाधान निकाल अपनी और अपने से जुड़े लोगो की ज़िन्दगी को संवार सकता है!

किसी राजा ने एक युवक की बहादुरी से ख़ुश होकर उसे राज्य का सबसे बड़ा सम्मान देने की घोषणा की। मगर पता चला कि वह युवक इससे ख़ुश नहीं है। राजा ने उसे बुलवाया और पूछा, “युवक, तुम्हें क्या चाहिए? तुम जो भी चाहो मैं तुम्हें देने के लिए तैयार हूं। तुम्हारी बहादुरी और साहस इन पुरस्कारों से बहुत ऊपर है।”

इस पर उस युवक ने जवाब दिया, “महाराज! क्षमा करें। मुझे मान-सम्मान, पैसा और पद नहीं चाहिए। मैं तो सिर्फ मन की शांति चाहता हूं।” राजा ने सुना तो वह बहुत मुश्किल में पड़ गया। उसने कहा, “तुम बड़ी अजीब चीज़ मांग रहे हो। जो चीज़ मेरे पास ही नहीं है वह मैं तुम्हें कैसे दे सकता हूँ।” मगर फिर कुछ सोचकर राजा बोला, “हां, मैं एक साधु को जानता हूं। शायद वें तुम्हें मन की शांति दे सकें।” राजा स्वयं उस युवक को लेकर साधु के आश्रम में गया। वह साधु अद्भुत रूप से शांत और प्रसन्न था।

राजा ने साधु से प्रार्थना की कि वे युवक को मन की शांति प्रदान करें। राजा ने उन्हें यह भी सफाई दी कि युवक ने अपनी असाधारण बहादुरी के लिए यही पुरस्कार मांगा है। मगर मैं ख़ुद ही शांत नहीं हूँ, फिर भला उसे कैसे शांति दे सकता था? इसलिए इसे आपके पास लेकर आया हूँ। इस पर वह साधु बोला, “राजन, शांति ऐसी संपदा नहीं है जिसे कोई ले या दे सके। उसे तो स्वयं ही पाना होता है। उसे न तो कोई दूसरा दे सकता है और न वह दूसरों से छीनी जा सकती है। शांति तो स्वयं से ही पाई जा सकती है। और स्वयं से शांति केवल तब ही कोई पा सकता है जब उसे अपने मन का ज्ञान हो जाता है!”

इस तरह ‘मनोज्ञान’ अर्थात मन का ज्ञान हो जाने पर ‘मन’ न केवल शांत हो जाता है बल्कि ज़िन्दगी की हर समस्या का तोड़ निकाला जा सकता हैं फिर चाहे वह समस्या व्यक्तिगत (Personal) हो, पढ़ाई (Study) से सम्बंधित हो, परिवार (Family) से सम्बंधित हो, व्यवसाय (Business) से सम्बंधित हो अथवा आध्यात्मिक (Spiritual) हो!

केके
WhatsApp @ 9667575858

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