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विचारों में बदलाव बुरे वक़्त को भी बदल सकता हैं! केके

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जब एक आम व्यक्ति किसी ख़ास को देखता है तो सोचता है कि भगवान ने ऐसे लोगो की क़िस्मत में ही ऐसा लिखा होता हैं चूंकि हम हर व्यक्ति को तब तक एक आम इन्सान ही समझते हैं जब तक कि उसे कुछ ख़ास हासिल नहीं हुआ हो और कुछ ख़ास हासिल होने पर … क़िस्मत का धनी। यह एक आम फितरत हैं।

पर क्या वाक़ई में कोई इन्सान पैदाइशी आम या ख़ास होता हैं ? क्या वाक़ई में इन्सान की तक़दीर उसके अपने हाथ में नहीं होती ? वक़्त इन्सान को बदलता हैं या इन्सान वक़्त को ? एक इन्सान की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा चिन्तन यही हैं! किसी का ऐसा चिन्तन नही करना ही उसके नही बदलने की सबसे बड़ी वजह हैं क्योंकि समय के साथ साथ यह विचार ही ज़िन्दगी को बदलने पर मज़बूर कर देता हैं।

जो इन्सान अपने अन्दर हर वक़्त चलने वाले विचारों पर गौ़र नहीं करता वो कभी कोई बदलाव नही ला पाता फिर चाहे वो कितना भी बदलने की कोशिश क्यों ना करे। और दिखावे के लिए किया गया बदलाव बहुत देर तक नहीं रह सकता। क्योंकि बदलाव की जड़ विचारों में हैं। जब तक विचार नहीं बदलते कुछ नहीं बदलता। और अपने विचारों को बदलने के लिए अपने आप से लड़ना पडता हैं

क्योंकि अवचेतन मन में बैठे पुराने विचारों को बाहर निकालकर उनकी जगह नयें विचारों को बिठाने के लिए उसी तरह मशक्क़त करनी होती हैं जैसे हमारे घर में घुस आये किसी घुसपैठियें को बाहर निकालने के लिए। हम अपना बुरा वक़्त बदलने के लिए सबकुछ करने को तैयार हैं … ज़रुरत पड़े तो लड़ने को भी तैयार हैं … परन्तु खुद से लड़ने को नहीं ! जबकी लड़ना खुद से होता हैं … क्योंकि बदलना खुद को पड़ता हैं किसी और को नहीं … खुद को बदलकर ही वक़्त को बदला जा सकता हैं … और बदलाव विचारों से होता हैं। लेकिन हम बजाय अपने विचारों को बदलने के अपने आप को लाचार…असहाय और …बेबस समझते रहते हैं और इस बात को कभी भी गहराई से समझने की कोशिश नहीं करते कि आखि़र क्या है जो हमें हमारे हालात को बदलने से रोकता है ! क्यों नहीं हम कभी अपने आप से ये सवाल करने के लिए वक़्त निकालते… मैं कहाँ जा रहा हूँ? … मैं क्यों जा रहा हूँ? … मैं कैसे जा रहा हूँ? आखि़र मैं चाहता क्या हूँ? परन्तु नहीं…! ये सब सोचने के लिए तो हमारे पास वक़्त ही नहीं हैं! बस दौड़ना हैं … क्योंकि सब दौड़ रहे हैं … कही मैं पीछे ना रह जाऊ! फिर चाहे एक दिन बैठकर ये सोचना पड़े कि आखि़र क्यों इतना दौड़ कर भी मैं अपने हालातों को नहीं बदल पाया ?

ऐसे वक़्त का आना केवल हमारे अपने विचारों का परिणाम होता हैं जिसके लिए हम सिवाय अपने विचारों के सबको ज़िम्मेदार ठहराते रहते है। ये हमारे विचार ही है जो कुछ भी बदल सकते हैं फिर चाहे वो हमारा बुरा वक़्त ही क्यों ना हो! परन्तु इसके लिए एक दृढ़ इच्छा शक्ति की जरुरत होती है जो कि केवल हमारे विचारों से ही पैदा की जा सकती हैं। स्वामी बुधानन्द जी ने एक बार अपने सम्बोधन में कहा था कि इच्छा शक्ति हो तो एक व्यक्ति शुन्य से भी सब कुछ पैदा कर सकता है।

वह हमेशा वैसे ही रहने के लिए बाध्य नहीं होता है। लेकिन ऐसी इच्छा शक्ति कोई भी व्यक्ति केवल अपने विचारों दृारा ही पैदा कर सकता है। लेखक तथा प्रेरक राल्फ वाल्डो इर्मसन ने कहा कि किसी भी जीत के लिए पहले खुद को जीतना पड़ता है अर्थात हालात चाहे जो भी हो विचार हर पल जीत के ही होने चाहिए। अतः अच्छा या बुरा हमारे अपने विचारों की उपज होती है। हम जो चाहते है वो सिर्फ हमारे विचारों से ही पैदा हो सकता है। अगर हम जैसा चाह रहे है वैसा नहीं हो रहा है तो हमें अपने अन्दर निरन्तर प्रवाहित विचारों पर ही ग़ौर करना चाहिए। वक़्त को करवट बदलते देर नहीं लगेगी।

केके
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