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मनोज्ञान – ‘ध्यान के लिए ‘मनोज्ञान’ एक ज़रुरत है!’ केके

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KK : ध्यान के लिए ‘मनोज्ञान’ एक ज़रुरत है! हो सकता है इसे पढ़ते ही ऐसा लगा हो कि ये क्या बात हुई कि, ‘ध्यान के लिए ‘मनोज्ञान’ एक ज़रुरत है!’ परन्तु जैसे ही स्वामी जी (स्वामी विवेकानन्द) के बचपन की एक घटना पढ़ने को मिलती है तो मन अपने आप ही महसूस करने लगता है कि क्यों ध्यान के लिए ‘मनोज्ञान’ एक ज़रुरत है। आइये पहले स्वामी जी के बचपन की वह घटना जान लेते हैं और फिर समझते हैं कि क्यों ध्यान के लिए ‘मनोज्ञान’ एक ज़रुरत है! KK

एक बार जब नरेन्द्र (स्वामी जी के बचपन का नाम) पूजागृह में अपने साथियों के साथ ध्यानमग्न था, तो एक साथी ने कमरे में एक भयानक सर्प देखा। उसने तुरन्त दूसरे साथियों को भी बताया। सभी साथी जान बचाकर बाहर भाग रहे थे, परन्तु नरेन्द्र ध्यान में ऐसा डूबा था मानों कुछ हुआ ही नहीं हो। जब इस बात का घरवालों को पता लगा तो सभी दौड़े आये। उन्होंने भी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर नरेन्द्र को उस भयानक सर्प के बारे में बताया परन्तु नरेन्द्र ज्यों का त्यों ध्यानमग्न बैठा रहा। वो भयानक सर्प भी फन ताने पास ही बैठा रहा। घर के लोग इस विस्मयजनक दृश्य को देखकर बहुत चिन्तित और दुःखी होते जा रहे थे और प्रकृति भी लगातार ये दृश्य देख रही थी! और देखिये थोड़ी ही देर बाद वो सांप अपने आप वहाँ से चला गया। जब नरेन्द्र का ध्यान टूटा तो घरवालों से सांप की बात सुनकर उसने कहा – ‘मुझे तो कुछ पता ही नहीं, मुझे तो किसी की आहट भी नहीं आयी।’

ये होता है ‘ध्यान’ और ध्यान की इस अवस्था तक पहुँचने के लिए ज़रुरी है ‘मनोज्ञान!’ और बच्चे नरेन्द्र का मनोज्ञान उसका एक ऐसा विशेष गुण था कि वह ध्यान के लिए बैठते ही अपनी सारी स्वभावगत वृतियों को भूलकर एकाग्र हो जाता था और अचेतन जैसी अवस्था में पहुंच जाता था। इसी सबंध में महान आविष्कारक और वैज्ञानिक ‘एलेग्जेंडर ग्राहम बेल’ ने भी कहा है, “अपना पूरा मन उस काम के प्रति एकाग्रता से लगा दें, जो आपको करना है। सूरज की किरणें भी तब तक नहीं जलातीं, जब तक कि उन्हें एक केंद्रित किरण का रूप नहीं दे दिया जाता है।”

इस तरह हर एक इन्सान को यह जान लेना ज़रुरी है कि किसी भी तरह के ध्यान के लिए चाहे फिर वह आध्यात्म के लिए हो या अध्ययन के लिए, किसी भी काम के लिए हो अथवा व्यापार के लिए, ‘मनोज्ञान’ होना एक ज़रुरत है! ‘मनोज्ञान’ ही किसी भी मन को सही अर्थ में ‘ध्यान’ की अवस्था में ले जा सकता है! और ‘मनोज्ञान’ होने पर ही मन ‘ध्यान’ की अवस्था में प्रवेश करता है! बिना ‘मनोज्ञान’ के ‘ध्यान’ अँधेरे में रौशनी तलाश करते रहना है!
(manogyaan | KK | Dhyaan)

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