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मनोज्ञान – ‘किसी भी शारीरिक या मानसिक बीमारी की जड़ मन में ही होती है!’ केके

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23 October 2020 Today’s Motivation | inspirational quotes in hindi , inspirational quotes | positive quotes | Today’s Motivation | success quotes | Manogayan KK |शारीरिक या मानसिक बीमारी

Manogayan KK Hindi, inspirational quotes, 23 October 2020 positive quotes: आज हम आपको Today’s Motivation quotes ‘शारीरिक या मानसिक बीमारी , success quotes बताने वाले हैं।

एक सेठ का घरेलू नौकर लंबे समय से उनके पास रहकर उनकी सेवा कर रहा था। वह बड़ा ईमानदार था। साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखता था। इसलिए सेठ जी उस से बहुत प्रसन्न रहते थे। एक दिन शाम को जब सेठ जी घर आये तो देखा कि उनकी पुरानी दीवार घड़ी टूटी पड़ी है। उन्होंने नौकर को बुलाकर पूछा, “यह घड़ी कैसे टूट गई?” नौकर ने कहा, “मालिक मैं सफाई कर रहा था कि घड़ी हाथ से छूट गई और टूट गई। ग़लती मेरी है, आप मुझे क्षमा करें।” सेठ तेज़ आवाज में बोले, “क्षमा मांगने से क्या होता है? घड़ी बरसों से कमरे में लगी थी, कमरे की शोभा थी, और तुम्हें तो पता ही है यह मुझे कितनी प्रिय थी। “डाँटने के आलावा सेठ जी और कर भी क्या सकते थे, बहुत भरोसे का नौकर जो था। रात को सेठ जी को नींद आ गई।

बार-बार घड़ी टूटने की बात मन में उठ आती थी। अचानक उनकी निगाह नौकर पर गई। वह खर्राटें ले रहा था। उससे सेठ को और भी दुःख हुआ। मालिक के नुकसान का उसे ज़रा भी ख्याल नहीं था। सेठ की आकुलता और नौकर की निराकुलता ने उनकी बेचैनी और बढ़ा दी। अगले दिन सेठ ने एक प्रयोग किया। नौकर ने दिन भर काम किया। शाम को सेठ ने उसे बड़े प्यार से बुलाया और कहा, “देखो, कल नुक़सान हो गया। इससे मेरा मन खिन्न हो गया था। इसीलिए मैंने तुम्हें डांटा था, पर यह तो कल की बात थी, आज तो मेरा मन प्रसन्न है, तुम मेरे साथ इतने दिन से हो और इतना अच्छा काम करते हो।

कल ही मेरे मन में आया था कि मुझे तुम्हारी सेवा के लिए कुछ इनाम देना चाहिए। सोचते-सोचते मैंने तय किया था कि क्यों न यह घड़ी ही तुम्हें दे दूँ। पर क्या करें, वह तो तुम्हारे हाथ से टूट गई। यदि नहीं टूटती तो आज तुम्हारी होती।” यह कहकर सेठ तो उस रात बड़े आनंद से सोया पर नौकर सारी रात करवटें बदलता रहा। बार-बार उसके मन में एक ही बात आती रही कि अगर घड़ी नहीं टूटती तो वह मुझे मिल जाती। इस तरह दुःख का कारण कोई बाहरी चीज़ नहीं आंतरिक सोच है।

हो सकता है इसे पढ़कर किसी को लगे कि यहां तक तो ठीक है कि इस तरह कि मानसिक पीड़ा या बीमारी की जड़ तो मन ही है परन्तु किसी शारीरिक बीमारी की जड़ मन में कैसे हो सकती है! तो इस बात को समझने के लिए ये समझना जरूरी है कि मन की अवस्था ही शरीर में होने वाले किसी भी तरह के प्रभाव को जन्म देती है अर्थात मन की अवस्था ही शारीरिक अवस्था तय करती है। मन जैसे व्यवहार करेगा शरीर भी वैसे ही व्यवहार करेगा। थोड़ा और गहराई से सोचने पर समझ आ जायेगा कि मन का नियंत्रण अथवा अनियंत्रण ही शरीर को नियंत्रित या अनियंत्रित करता है!
केके
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