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मनोज्ञान – ‘संगठन एक शक्ति बन जाती है!’ केके

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एक कहावत है, ‘एक और एक ग्यारह होते हैं!’ अथवा ‘एका में बहुत शक्ति है! (Union is Strength!)’ यह कोई नई बात नहीं है। यह तो एक अटूट सत्य था, है, और रहेगा। यह सत्य एक परिवार से लेकर पूरे विश्व का है अर्थात ऐसा ‘संगठन’ एक परिवार हो सकता है, एक संस्था हो सकती है, एक वर्ग विशेष हो सकता है, एक जिला हो सकता है, एक राज्य हो सकता है, एक देश हो सकता है अथवा पूरा विश्व हो सकता है! परन्तु हर एक व्यक्ति को ‘संगठन’ का शाब्दिक अर्थ ही नहीं, वास्तविक अर्थ भी समझना चाहिए क्योंकि जब तक वास्तविक अर्थ नहीं समझ आता तब तक एक शब्द ‘शब्द’ ही रह जाता है। इसलिए सही मायने में कोई भी ‘संगठन’ एक सच्चे अर्थ में ‘शक्ति’ तभी बन पाता है जब वो संगठित लोग भले ही साक्षर हो या नहीं परन्तु ‘शिक्षित’ हो! और एक इंसान वास्तविक रूप में ‘शिक्षित’ तब होता है जब वो अपने अंदर संवेदनशीलता, सच्चाई, निश्छल आचरण, समर्पणभाव, मेहनत, सहनशक्ति, वफ़ादारी, विश्वास, और समझदारी अर्थात सूझबूझ के गुण पैदा कर लेता है! अनादिकाल से जब-जब जहाँ-जहाँ ऐसे शिक्षित लोगों के संगठन बने हैं विजय, जीत, सफलता या कामयाबी ने ख़ुद उस संगठन के मस्तक को सजाया है!पांडव जब अज्ञातवास से लौटे तो उनके लिए परिस्थितियां और भी जटिल हो गयी थीं। कौरव उनकी एक भी सुनने को तैयार नहीं थे। पांडव इस बात से बहुत चिंतित थे। एक पल के लिए उनके मन में आया कि कौरवों के संख्या बल के आगे वे परास्त हो जाएंगे। चिंता के इन क्षणों में अचानक कृष्ण पांडवों के सामने प्रकट हुए। उन्होंने पांडवों को मुस्कराते हुए समझाया कि जीत अंततः पांडवों की ही होगी। अर्जुन ने उनसे तर्क किया, लेकिन कैसे? कृष्ण ने उत्तर दिया, “अर्जुन, तुम बेशक सिर्फ पांच हो पर एक मत वाले हो, लेकिन सौ की संख्या में कौरव बंधु अलग-अलग मत वाले हैं। तुम्हें तो मालूम है कि एकता की शक्ति की ही सदैव विजय होती है। कौरव एक साथ जरूर लड़ने वाले हैं, लेकिन उनमें अनेक मुद्दों पर गहरे विवाद हैं। परन्तु आप लोग एक हैं, इसलिए विजय पताका आपके रथ पर ही लहरायेगी।” और पांडवों की ‘संगठन शक्ति’ ने ही महाभारत के परिणाम की कृष्ण द्वारा की गयी भविष्यवाणी को सच साबित कर दिया!

केके
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