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मनोज्ञान – ‘उत्साह’ कोरोना से भी ज़्यादा ख़तरनाक एक ऐसा विषाणु (Virus) है जो बिना छुएँ दूर से ही ‘सकारात्मक सोच’ से संक्रमित कर देता है और ‘मनोज्ञान’ वो उत्साह पैदा कर देता है। केके

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प्राचीन समय में एक राजा था। राजा की महान सेना में एक हाथी भी शामिल था जो युद्ध कौशल में पारंगत था। राजा उसी पर सवार होकर युद्ध लड़ने जाता था और विजयी होकर लौटता था। राजा को अपने इस हाथी पर बहुत गर्व था लेकिन समय के साथ हाथी बूढ़ा होने लगा। राजा ने युद्ध पर जाने के लिए अब दूसरे हाथी का चयन कर लिया था। बूढ़ा हाथी अकेला रहने लगा था। एक दिन घूमते-घूमते वह गहरे तालाब में गया और दल-दल में फंस गया। हाथी ज़ोर-ज़ोर से चिंघाड़ने लगा। आवाज सुनकर लोग इकट्ठा हो गए। राजा और मंत्री तक सूचना पहुंचाई गई कि उनका प्रिय हाथी फंस गया है। राजा मौके पर पहुंचा और उसे निकालने की हर संभव जुगत लगाई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आख़िर में किसी ने राजा को बताया कि गौतम बुद्ध नज़दीक ही हैं और इस जंगल से गुजरने वाले हैं। राजा ने सोचा क्यों न हाथी को बचाने के लिए उनसे सलाह ली जाए? राजा स्वयं गौतम बुद्ध के पास गए और पूरा घटनाक्रम बताया। गौतम बुद्ध ने जो उपाय सुझाया, उसे सुनकर हर कोई चौंक गया। गौतम बुद्ध ने कहा, इस हाथी को बाहर निकालना है तो युद्ध के नगाड़े बजाए जाएं। राजा के सिपाहियों ने ऐसा ही किया और जैसे ही नगाड़े बजने शुरू हुए, हाथी में जोश आ गया और उसके पैर तेज़ी से चलने लगे। वह बिना किसी की मदद से ख़ुद ही दलदल से बाहर आकर दौड़ पड़ा।

कुछ परिस्थितियां इंसान को तोड़कर रख देती हैं। तब उसे लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता। चारों तरफ से फंसने के बाद समझ नहीं आता कि बाहर निकलने का रास्ता कौनसा है। तब मन में पैदा हुआ उत्साह ही स्वयं को उस शक्ति का एहसास दिलाता है जो ख़ुद में पहले से मौजूद है। लेकिन कई बार कठिन परिस्थितियों में उस शक्ति का अहसास नहीं हो पाता है। ऐसे में यदि किसी भी तरह के सहारे से मन में एक बार उत्साह-उमंग जग जाए तो फिर काम करने की ऊर्जा ख़ुद-ब-ख़ुद ही मिलने लगती है। और कार्य के प्रति उत्साह का मनुष्य की उम्र से कोई संबंध नहीं रहता है। उत्साह में किसी भी उम्र का व्यक्ति कोई भी कार्य कर सकता है। और ‘मनोज्ञान’ ऐसा उत्साह पैदा कर देता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में, “साहस-पूर्ण आनन्द की उमंग का नाम उत्साह है। उत्साह में हम आने वाली कठिन स्थिति के भीतर साहस के अवसर के निश्चय द्वारा प्रस्तुत कर्म-सुख की उमंग से अवश्य प्रयत्नवान् होते हैं। उत्साह में कष्ट या हानि सहने की दृढ़ता के साथ-साथ कर्म में प्रवृत्ति होने के आनन्द का योग रहता है। कर्म-सौन्दर्य के उपासक हो सच्चे उत्साही कहलाते हैं।”

केके
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