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इस आर्टिकल द्वारा हमारे मन विशेषज्ञ केके द्वारा जानिए सकारात्मक और नकारात्मक सोच का प्रभाव!

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sakaratmak soch | nakaratmak Soch | sakaratmak aur nakaratmak Soch in hindi Artical | sakaratmak soch ki shakti | soch ki shakti | इस आर्टिकल द्वारा जानिए किस तरह sakaratmak soch aur nakaratmak soch में कितनी शक्ति होती है और इसके आपके जीवन में क्या प्रभाव पड़ता हैं

sakaratmak aur nakaratmak Soch : मेंढ़कों का एक झुण्ड जंगल से होकर गुजर रहा था। उनमें से दो एक गहरे गड्डे में गिर गए। सभी मेंढ़क उस गड्डे के चारों तरफ इकठ्ठे हो गए। जब उन्होने देखा कि गड्डा कितना गहरा था तो उन्होनें उन दोनों को बताया कि वे दोनों अब बच नहीं सकते और उन्हें अपने आपको मरा हुआ समझना चाहिए। उन दोनों ने उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं देते हुए अपनी पूरी ताक़त के साथ उस गड्डे से बाहर आने के लिए कूदने की कोशिश की।

सभी मेंढ़क चिल्लाने लगे कि उनकी इस कोशिश का कोई फायदा नहीं होने वाला और उन्हें अपने मरने का इंतज़ार करना चाहिए। इसी के चलते अंत में एक ने उनकी बात को मान लिया और गिरकर मर गया। जबकि दूसरा अपनी पूरी ताक़त के साथ लगातार कूदता रहा। एक बार फिर सभी मेंढ़क चिल्लाए और कहा कि उसे इतना दर्द सहने के बजाय रुक जाना चाहिए। परंतु उसने किसी की नही सुनते हुए अपनी पूरी ताक़त के साथ और कोशिश की। और अंत में वह बाहर निकलने में सफल हो ही गया।

जब वह बाहर निकला तो सभी ने पूछा कि क्या उसने उनकी बात को नहीं सुना उसने उन्हें बताया कि वह तो सुन ही नहीं सकता। उसने तो सोचा कि वे सभी लगातार उसे बाहर आने के लिए और कोशिश करने के लिए कह रहे थे और उनकी इसी बात ने उसे अपने अंदर बाहर निकलने की ताक़त होने पर यक़ीन करने में मदद की जिससे की वह पूरी ताक़त लगाकर बाहर आने में सफल हो सका।

ऐसा जादू होता है शब्दों का, चाहे फिर वो जानबूझकर बोले गए हो या फिर अनजाने में। जब हम कोई बात व्यावसायिक तौर पर या औपचारिक तौर पर ना बोल रहे हो तब हम मुश्किल से ही अपनी शब्दावली के चुनाव पर ध्यान देते है। उल्टे बिना सोचे समझे हम ऐसा कुछ भी बोल जाते है जिसका हमें भान तक नहीं होता कि हमने अनजाने में अपने शब्दों से क्या कर दिया। चूंकी औपचारिक बातचीत का उद्देश्य ही एक को बोलना और दूसरे को सुनना होता है

अतः दोनों बहुत सोच समझकर बातचीत करते है और अपने शब्दों का भी ध्यान रखते हैं परंतु हम अधिकतर समय औपचारिक बातचीत नहीं करते। हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अनौपचारिक बातचीत करते है अतः हमारे शब्दों का चुनाव उसी तरह का होता जाता है जैसा कि हम हमारी रोज़ाना की बोलचाल में इस्तेमाल करते है।

ना हम इतना सोच समझकर बोल रहे होते है और ना ही हमें सुनने वाला इतना सावधान होता है कि हर वक़्त वो यह ध्यान रखे कि उसे हमारे बोले हुए शब्दों में से किन्हे लेना है और किन्हें नहीं जबकि हर शब्द हमारे अवचेतन मन पर अपना प्रभाव छोड़ता है चाहे वो औपचारिक बातचीत में बोला गया हो या अनौपचारिक ढंग से। अतः हमें अपनी रोज़ाना की बातचीत में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों पर भी बहुत ध्यान देना चाहिए।

भगवान बुद्ध के मतानुसार हम जब भी और जो भी शब्द बोले वो बहुत ही सोच समझकर बोलना चाहिए क्योंकि जो भी उन्हें सुनता है वे उस पर अच्छे या बुरे के लिए अपना प्रभाव जरूर छोड़ते है। अतः हमें अपने हर शब्द पर ध्यान देना चाहिए चाहे फिर वो औपचारिक तौर पर अथवा अनौपचारिक ढंग से बोला जा रहा हो चूंकि हमारा बोला हुआ एक भी शब्द अगर किसी को बना सकता है तो किसी को बिखेर भी सकता है।

अगर आपके मन में किसी भी तरह का का कोई प्रश्न हो या कोई समस्या हो तो आप निचे दिए आर्टिकल sakaratmak aur nakaratmak Soch के कॉमेंट्स बॉक्स में मैस्ज कर के पूछ सकते हैं या आप आदरणीय मन विशेषज्ञ केके जी से निचे दिये गए नंबर पर मैस्ज़ कर सकते हैं
WhatsApp @ : 966 757 5858

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