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मनोज्ञान – ‘मन का ज्ञान’ ही ‘धन का ज्ञान’ है! केके

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‘मन का ज्ञान’ ही ‘धन का ज्ञान’ है!

कोई भी व्यक्ति किसी भी वस्तु की क़ीमत का अंदाज़ा तब ही लगा सकता है जब उसमे मन की समझ हो। मन के ज्ञान के बिना कोई भी वस्तु हाथ से छूट जाती है फिर चाहे वह कितनी ही क़ीमती क्यों न हो। इसलिए मन का ज्ञान पाना ही धन का ज्ञान पाना है!

एक बार एक धोबी अपने गधे के गले में पत्थर लटकाए जंगल से गुजर रहा था। दूसरी ओर से आते हुए एक जौहरी ने देखा कि वह पत्थर दरअसल हीरा था। धोबी को उसकी कोई जानकारी नहीं थी। जौहरी ने धोबी को रोककर पूछा, “क्यों भाई, यह पत्थर खरीदना चाहूं तो कितने में बेचोगे?” धोबी को पहले कुछ समझ में नहीं आया। उसने सोचा यह कोई पागल है जो पत्थर खरीद रहा है। उसने मौज में कह दिया, “मैं इस पत्थर का एक रूपया लूंगा।” “नहीं भाई, आठ आने में देना है तो बोलो।” जौहरी आठ आने बचाने की फिराक में बोला। पर धोबी अड़ गया।

जौहरी ने यह सोचकर की थोड़ी देर में मान जाएगा, उसे आगे जाने दिया। थोड़ी दूर जाने पर एक और जौहरी पत्थर की असलियत पहचान धोबी से पूछ बैठा, “क्यों भाई, यह पत्थर कितने में बेचोगे?” धोबी फिर चौंका। इस बार उसने कहा वह पत्थर के दो रुपये लेगा। जौहरी ने दो रुपये निकाले और पत्थर लेकर चलता बना। इतने में पहले वाला जौहरी हांफते हुए आया, “बोला, “भाई लो, अपना पूरा रूपया ले लो, मुझे पत्थर दे दो।” धोबी ने बताया कि पत्थर तो दो रुपये का बिक चुका। जौहरी बहुत बिगड़ा, “मुर्ख वह पत्थर नहीं लाखों का हीरा था।” उसकी बात सुन धोबी को हंसी आई,”लाखों के फायदे को आपने आठ आने के लाभ के लिए छोड़ दिया। आप लोभी तो हैं ही मूर्ख भी हैं।”

केके
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