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मनोज्ञान – ‘मन का ज्ञान’ ही ‘सत्य और सादगी का ज्ञान’ करवाता है!’ केके

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‘मन का ज्ञान’ ही ‘सत्य और सादगी का ज्ञान’ करवाता है!’

‘सत्य का ज्ञान’
राजकोट के अल्फ्रेड हाई स्कूल की घटना है। हाई स्कूल का मुआयना करने आये हुए थे, शिक्षा विभाग के तत्कालीन इंस्पेक्टर जाइल्स। नौवीं कक्षा के विद्यार्थियों को उन्होंने श्रुतलेख (Dictation) के रूप में अंग्रेजी के पांच शब्द बोले, जिनमें एक शब्द था – केटल। कक्षा का एक विद्यार्थी मोहनदास इस शब्द की स्पेलिंग ठीक से नहीं लिख सका।

मास्टर साहब ने उसकी कॉपी देखी और उसे अपने बूट की ठोकर से इशारा किया कि वह अगले विद्यार्थी की कॉपी से नकल करके स्पेलिंग ठीक लिख ले, पर मोहनदास ने ऐसा नहीं किया। अन्य सभी विद्यार्थियों के सभी शब्द सही थे। अकेले मोहनदास इस परीक्षा में शतप्रतिशत रिजल्ट न दिखा सके।

इंस्पेक्टर के चले जाने के बाद मास्टर ने कहा-“तू बड़ा बुद्धू है मोहनदास। मैंने तो तुझे इशारा किया था, परन्तु तूने अपने आगे वाले लड़के की कॉपी से नकल तक नहीं की। शायद तुझे अक्ल ही नहीं।” मोहनदास ने दृढ़ता से कहा-“ऐसा करना धोखा देने और चोरी करने जैसा है, जो मैं हर्गिज़ नहीं कर सकता।”

‘मन का ज्ञान’ ही ‘सत्य और सादगी का ज्ञान’ करवाता है!’

‘सादगी का ज्ञान’
शास्त्रीजी के घर पर मंत्री एवं देशी-विदेशी अथितियों का सदैव ही ताँता लगा रहता था। उनके मकान में इतनी अधिक सादगी थी कि सभी देखकर चकित हो जाते थे। एक बार सर्दी का मौसम था। लोकनिर्माण विभाग के कर्मचारियों ने शास्त्रीजी के कमरे में कई सजावटी सामान सहित एक कालीन भी बिछवा दिया।

घर पर बच्चे यह सजावट देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। शास्त्रीजी ने जब घर आकर वह कालीन देखा तो उन्होंने तुरंत कर्मचारियों को रोका और बोले-“जिस वस्तु के बिना मेरा कार्य चल सकता है तो उसे खरीदने की क्या आवश्यकता है? यह फिजूल का खर्चा है। इस धन को तुम लोग गरीबो में बाँट दो या किसी गाँव की सड़क का निर्माण करने में इस धन का उपयोग करो।”

केके
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