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मनोज्ञान – ‘मन की हर एक अवस्था चेतन मन (Conscious Mind), अवचेतन मन (Subconscious Mind) और ब्रह्मांडीय या पराभौतिक मन (Superconscious Mind) को ‘मनोज्ञान’ से ही समझा जा सकता है!’ केके

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मनोज्ञान- KK – ‘मन की हर एक अवस्था Conscious Mind , Subconscious Mind और Superconscious Mind को ‘मनोज्ञान’ से ही समझा जा सकता है!’

एक साधक ने किसी महात्मा के पास जाकर उनसे प्रार्थना की कि ‘मुझे आत्मसाक्षात्कार का उपाय बताइये।’ महात्मा ने एक मन्त्र बताकर कहा कि ‘एकान्त में रहकर एक साल तक इस मन्त्र का जाप करो; जिस दिन वर्ष पूरा हो, उस दिन नहाकर मेरे पास आना।’ साधक ने वैसा ही किया। वर्ष पूरा होने के दिन महात्मा जी ने वहाँ झाडू देने वाली भंगिन से कह दिया कि जब वह नहा-धोकर मेरे पास आने लगे, तब उसके पास जाकर झाडू से गंदगी उड़ा देना। भंगिन ने वैसा ही किया। साधक को क्रोध आ गया और वह भंगिन को मारने दौड़ा। भंगिन भाग गयी। वह फिर से नहाकर महात्मा जी के पास आया। महात्मा जी ने कहा – ‘भैया! अभी तो तुम साँप की तरह काटने दौड़ते हो।

मनोज्ञान – ‘मन की हर एक अवस्था Conscious Mind , Subconscious Mind और Superconscious Mind को ‘मनोज्ञान’ से ही समझा जा सकता है!’ KK

सालभर और बैठकर मन्त्र-जप करो, तब आना।’ साधक को बात कुछ बुरी तो लगी, पर वह गुरु की आज्ञा समझकर चला गया और मन्त्र-जप करने लगा। दूसरा वर्ष जिस दिन पूरा होता था, उस दिन महात्मा जी ने उसी भंगिन से कहा की ‘आज जब वह आने लगे, तब उसके पैर से जरा झाडू छुआ देना।’ उसने कहा, ‘मुझे मारेगा तो। महात्मा जी बोले, ‘आज मारेगा नहीं, बककर ही रह जाएगा।’ भंगिन ने जाकर झाडू छुआ दिया। साधक ने झल्लाहट से दस-पाँच कठोर शब्द सुनाये और फिर नहाकर वह महात्मा जी के पास आया। महात्मा जी ने कहा – ‘भाई! काटते तो नहीं पर अभी साँप की तरह फुफकार तो मारते ही हो। ऐसी अवस्था में आत्मसाक्षात्कार कैसे होगा। जाओ एक वर्ष और जप करो।’ इस बार साधक को अपनी भूल दिखायी दी और मन में बड़ी लज्जा हुई। उसने इस को महात्मा जी कृपा समझा और वह मन-ही-मन उनकी प्रशंसा करता हुआ अपने स्थान पर आ गया। उसने सालभर फिर मन्त्र-जप किया। तीसरा वर्ष पूरा होने के दिन महात्मा जी ने भंगिन से कहा कि ‘आज वह आने लगे तब कूड़े की टोकरी उस पर उड़ेल देना।

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अब वह खीझेगा भी नहीं।’ भंगिन ने वैसा ही किया। साधक का चित निर्मल हो चूका था। उसे क्रोध तो आया ही नहीं। उसके मन में उलटे भंगिन के प्रति कृतज्ञता की भावना जाग्रत हो गयी। उसने हाथ जोड़कर भंगिन से कहा – ‘माता! तुम्हारा मुझ पर बड़ा ही उपकार है जो तुम मेरे अंदर के एक बड़े भरी दोष को दूर करने के लिये तीन साल से बराबर प्रयत्न कर रही हो। तुम्हारी कृपा से आज मेरे मन में जरा भी दुर्भाव नहीं आया। इससे मुझे ऐसी आशा है कि मेरे गुरु महाराज आज मुझको अवश्य उपदेश देंगे।’ इतना कहकर वह स्नान करके महात्मा जी के पास जाकर उनके चरणों पर गिर पड़ा। महात्मा जी ने उठाकर उसको हृदय से लगा लिया। मस्तक पर हाथ फिराया और ब्रह्मा के स्वरूप का उपदेश किया। शुद्ध अन्तःकरण में तुरंत ही उपदेश के अनुसार धारणा हो गयी। अज्ञान मिट गया। ज्ञान तो था ही, आवरण दूर होने से उसकी अनुभूति हो गयी और साधक निहाल हो गया।

केके
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