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मनोज्ञान – ‘जिस मन में सीखने का भाव नहीं है, वह ख़ुद को नहीं बदल सकता!’ केके

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13 October 2020 KK | Article 13 October 2020 in Hindi | Today KK Article | Manogayan

सीखता वो ही है जो सीखने का भाव रखता है अर्थात जो सीखना चाहता है। मन का स्वभाव है परिवर्तन। जो मन सीखता है वो बदलाव महसूस करता है। और जो मन बदलाव महसूस करता है वो बदलता जाता है। चूँकि बदलाव ही ज़िन्दगी को गतिशील (Dynamic) रख सकता है इसलिए सीखते रहना उतना ही ज़रूरी है जितना कि सांसें लेते रहना। जो ज़िन्दगी गतिशील नहीं रहती वो उदासी महसूस करना शुरू कर देती है। इसलिए मन को गतिमान रखने के लिए सीखने का भाव रखना न केवल ज़रूरी है बल्कि एक अनिवार्यता (Necessity) है। आइये इसे हम एक हास्यप्रद कहानी (Funny Story) से समझते है।

13 October 2020 KK | KK Article 13 October 2020 in Hindi | Today KK Article | Manogayan

एक अज्ञानी व्यक्ति नगर में गया और एक आदमकद शीशा ले आया। घर के लोगों ने कभी नहीं देखा था कि शीशा क्या होता है। उसने घर में शीशा रख दिया। पत्नी शीशे के सामने आते ही चौंक पड़ी। व सीधे सास के पास पहुँची। उसने सास से कहा, “आज बड़ा अनर्थ हो गया।” सास ने पूछा, “क्या हो गया?” बहु ने कहा, “आपका बेटा दूसरी बहू ले आया है।” सास बोली, “यह कैसे हो सकता है? मैं अभी जाकर देखती हूँ।” वह शीशे के पास गई। उसने शीशे में देखा और बेटे की ओर मुँह करके बोली, “अरे, तू यह दूसरी बूढ़ी स्त्री कहाँ से ले आया?” अज्ञान से ही भ्रम उत्पन्न होता है। इस भ्रम में फंसे हुए हम लोग कभी वास्तविकता से रूबरू नहीं हो पाते।

केके
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