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मनोज्ञान – मन को समझने के लिए पहला क़दम ‘अहंकार’ को तोड़ना है! केके

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‘अहंकार’ ही वो जड़ है जो मन को ‘अंधा’ किये रखती है। जब तक ‘अहंकार’ है तब तक ‘अज्ञानता’ है। और जब तक ‘अज्ञानता’ है तब तक ‘अंधेरा’ है। किसी भी मन को, चाहे वो स्वयं का हो या किसी अन्य का, तभी समझा जा सकता है जब मन का अंधेरा ख़त्म हो जाये। अंधेरे को केवल रौशनी ही ख़त्म कर सकती है जो कि ज्ञान से ही आती है। ‘ज्ञान’ ही ‘अहंकार’ नामी जड़ को काट सकता है। और यह ज्ञान ही है ‘मनोज्ञान!’

एक बार रामकृष्ण परमहंस के दो शिष्य अपनी विद्वता को लेकर विवाद करने लगे। उनमें से एक स्वयं को बड़ा मान रहा था तो दूसरा स्वयं को बड़ा मान रहा था। इस वरिष्ठता के कारण दोनों का विवाद काफी बढ़ गया। आखिर जब वे दोनों नहीं माने तो हारकर उन्हें गुरुदेव के पास जाना पड़ा और गुरुदेव से बोले – “गुरुदेव! हम दोनों में से कौन बड़ा है?” परमहंस ने दोनों की ओर देखा, फिर बोले – “अरे! यह भी कोई समस्या है बस इतनी छोटी बात पर तुम दोनों उलझ रहे हो।” वे दोनों शिष्य अपने बैर को भूलकर एक-दूसरे के मुँह की ओर हतप्रभ से देखने लगे। तब परमहंस जी बोले

– “तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो बड़ा सरल है। बच्चो! जो दुसरे को अपने से बड़ा समझता है वही बड़ा भी है और श्रेष्ठ भी।” दोनों शिष्य सिर झुकाए गुरु के सामने से आ गए। उन्हें अपनी भूल का अहसास हो गया था।

केके
WhatsApp @ 9667575858

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