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मनोज्ञान – ‘मन ही धन है!’ केके

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गुरुकुल के प्रधान आचार्य अब वृद्ध हो चले थे। अपना भार किसी योग्य कंधों पर डालकर वे चाहते थे कि अब संन्यास ग्रहण किया जाए। लेकिन प्रश्न योग्य उत्तराधिकारी के चुनाव का था। उनका प्रत्येक शिष्य आचार्य का गौरवशाली पद पाने को लालायित था। आचार्य ने घोषणा की कि शरदपूर्णिमा के दिन सभी शिष्यों की उपस्थिति में वे अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करेंगे। शरद पूर्णिमा की उज्जवल चांदनी में आश्रम का प्रांगण खचाखच भरा हुआ था।

प्रांगण का वातावरण तनाव भरा था। प्रत्येक स्वयं को योग्य पा रहा था। कहीं-कहीं इस संबंध में गुपचुप चर्चा भी सुगबुगा रही थी। आचार्य के प्रवेश के साथ ही स्तब्धता छा गई। आचार्य ने बिना कोई भूमिका बनाए कहा, “हम सब आज यहां क्यों एकत्रित हुए हैं, सभी जानते हैं। मेरा एक प्रश्न है, जो भी उसके उत्तर से मुझे संतुष्ट कर देगा, वही इस गौरवशाली पद पर आसीन होगा।” सभा स्तंभित थी। आचार्य ने प्रश्न किया, “कौन मूल्यवान है, लोहा या चांदी?” प्रश्न साधारण था। इसका जवाब तो एक साधारण व्यक्ति भी दे सकता है। कौन नहीं जानता कि चांदी लोहे से ज्यादा मूल्यवान होती है। समूचा शिष्य समूह भी इसी बात से सहमत था।

लेकिन एक शिष्य ने इससे असहमति जतायी। आचार्य ने पूछा, “क्यों? असहमति का कारण?” “कारण एकदम स्पष्ट है गुरुदेव! पारस के स्पर्श से चांदी स्वर्ण नहीं बन सकती, जबकि लोहा स्वर्ण बन सकता है। गुरुदेव! मेरा मानना है कि मूल्यवान कोई वस्तु नहीं हुआ करती, मूल्यवान तो उसे बनाती हैं, उसमें छिपी संभावनाएं।” गुरुदेव ने अपने आसन से उठकर उस शिष्य की अपने उत्तराधिकारी के रूप में घोषणा कर दी। कोई विरोध का शब्द नहीं उठा।

केके
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