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मनोज्ञान – ‘मन (दिल) का ध्यान (Concentration) ही मस्तिष्क (दिमाग़) को तेज़ कर सकता है!’ केके

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एक बार स्वामी विवेकानंद ने प्रसिद्ध विचारक एवं दार्शनिक सर जॉन लबॉक की पुस्तक पढ़ने के लिए मंगवाई। उन्होंने एक ही दिन में सारी पुस्तक पढ़ ली। दूसरे दिन अखंडानंद जी वह पुस्तक जमा करवाने ले गए तो लाइब्रेरियन को विस्मय हुआ। लाइब्रेरियन को इसलिए अचंभा हुआ क्योंकि पिछले कई दिनों से अखंडानंद जी बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़ने के लिए ले जाते थे एवं दूसरे दिन पुनः जमा करवा देते थे। लाइब्रेरियन ने अखंडानंद जी से पूछा, “महाशय, आप पुस्तकें पढ़ते हैं या सिर्फ उनके पन्ने पलटकर ही वापस कर देते हैं।” अखंडानंद जी मुस्कराकर रह गए। जब यह बात स्वामी विवेकानंद को पता चली, तब वे स्वयं पुस्तकालय में गए। उन्होंने विनम्रतापूर्वक लाइब्रेरियन से कहा, “अखंडानंद प्रतिदिन मेरे लिए पुस्तकें लाते हैं। मैं पुस्तकें पूरी की पूरी पढ़कर दूसरे दिन उन्हें जमा कराने के लिए वापस भेज देता हूँ। क्या आपको कोई आपत्ति है?” लाइब्रेरियन बोला, “स्वामी जी! सर जॉन लबॉक जैसे गहन तत्व चिंतक की पुस्तक एक ही दिन में कैसे पढ़ी जा सकती है?” स्वामी जी बोले, “मैंने एक ही दिन में पूरी पुस्तक पढ़ डाली है, फिर भी आपको संदेह हो तो पुस्तक में से चाहे जिस विषय पर मुझसे कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं।” लाइब्रेरियन स्वामी जी से सर जॉन लबॉक की पुस्तक में से एक के बाद एक प्रश्न पूछने लगा। स्वामी जी ने सभी प्रश्नों के उत्तर तो दिए ही, साथ ही यह भी बताया कि प्रश्न का उत्तर पुस्तक में कहां है? लाइब्रेरियन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह विवेकानंद से क्षमा मांगने लगा।

ऐसी होती है ‘एकाग्रता’ अर्थात ध्यान (Concentration)! मस्तिष्क का मंद या तेज़ होना ‘मन’ अर्थात दिल की एकाग्रता पर निर्भर करता है। हर एक दिमाग़ की क्षमता समान ही होती है परन्तु उसका दोहन (उपयोग) ‘मन’ की एकाग्रता (Concentration) तय करती है। जिस किसी को भी अपने मस्तिष्क (दिमाग़) को तेज़ करना हो उसे अपने ‘मन’ को एकाग्र (Concentrate) करना शुरू कर देना चाहिए।

केके
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