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मनोज्ञान – ‘बच्चों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ ज़रूरी है मन का ज्ञान!’ केके

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मनोज्ञान – ‘बच्चों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ ज़रूरी है मन का ज्ञान!’ केके

कई बार हमें बच्चों से सुनने को मिलता है, ‘मेरा पढ़ने का मन नहीं है’, ‘मेरा पढ़ने का मन नहीं कर रहा है’, अथवा ‘मेरा पढ़ने का मन नहीं करता है!’ परन्तु कभी-कभी हमारे सामने ऐसे भी बच्चे आ जाते हैं जिनसे ये भी सुनने को मिल जाता है, ‘मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है’, ‘मेरा पढ़ने का बहुत मन करता है’, अथवा ‘मेरा पढ़ने का ही मन करता है!’

मनोज्ञान केके

क्या कभी हमने बैठकर इस बात पर ढंग से विचार किया है कि आख़िर ऐसा क्यों होता है! आख़िर क्यों जहाँ एक मन को जो अच्छा लगता है वहीं दूसरे मन को उसके उलट! हर इंसान बच्चा होकर ही बड़ा होता है और हर बच्चे के अपने अनुभव होते हैं। हम सभी के अपने-अपने अनुभव हैं और हम सभी ये बात जानते हैं कि बच्चों के साथ ऐसा होता है। इसलिए इसे समझने के लिए हमें बैठकर अपने अतीत में भी झांकना चाहिए और देखना चाहिए कि जब हम बच्चे थे तब हमारा मन जैसा व्यवहार करता था वैसा क्यों करता था। ऐसा करने पर मन के इस फर्क़ को समझने के साथ-साथ हम ये भी समझ सकेंगे कि क्यों ज़रूरी है बच्चों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ मन का ज्ञान!

अंग्रेज़ी साहित्यकार डेनियल बचपन में बहुत ग़रीब थे। वे जिस स्कूल में पढ़ते थे, उसमें एक दिन ग़रीब छात्रों को सहायता स्वरूप कॉपी-किताब जैसी कुछ चीज़ें बांटी जा रही थीं। स्कूल से मिलने वाली सहायता का सामान उन्होंने भी ले लिया। जब वे घर आए तो उनके पास नई कॉपियां और किताबें देखकर उनकी माँ ने पूछा कि उन्हें वे कहाँ से प्राप्त हुईं। जब माँ को पूरी बात का पता चला तो उन्होंने डेनियल से कहा, “जाओ, इन्हें वापस कर आओ। 4

मनोज्ञान केके : यह सहायता उनके लिए है जो बिल्कुल बेसहारा हैं। हमें उनका हक़ मारने की कोशिश नहीं करनी चाहिए जो असहाय हैं!” डेनियल को सहायता के रूप में मिली चीज़ें स्कूल में वापस कर देनी पड़ीं। इस घटना ने डेनियल को ख़ुद ही मेहनत कर अपनी ज़रूरतें पूरी करने का सबक़ सिखा दिया। बच्चों को नैतिकता और स्वाभिमान की जो शिक्षा स्कूलों में किताबों के माध्यम से दी जाती है, उससे कहीं गहरी छाप उनके मन पर उस शिक्षा से पड़ती है जो उनके अपने घरों में उन्हें उनके माँ-बाप के व्यवहार से मिलती है!

मनोज्ञान केके : तो इस तरह हमें यह समझना चाहिए कि किसी भी बच्चे के मन पर जैसा भी प्रभाव पड़ता है उसकी जड़ उसका अपना घर होता है। मन का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वो व्यवहार से प्रभावित होता है। और इस व्यवहार की जड़ है घर। इसलिए अब हमें यह समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि ‘बच्चों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ ज़रूरी है मन का ज्ञान!’ और हम बच्चों के मन पर जैसा प्रभाव डालना चाहते हैं, उन्हें मन का जैसा ज्ञान देना चाहते हैं वो अक्षरों के ज्ञान से नहीं हमारे अपने मन के ज्ञान से मिलेगा!

केके
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