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मनोज्ञान – ‘जो मन जितना ज्ञान पाता है, वह उतना ही Rachanaatmak बन जाता है।’ केके

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‘जो मन जितना ज्ञान पाता है, वह उतना ही Rachanaatmak बन जाता है।’ | Hamara Today

मन और ज्ञान, दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं! जब दोनों मिलते हैं तभी रचनात्मकता (क्रिएटिविटी) पैदा होती है। क्योंकि जब तक मन को ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता तब तक वह इधर-उधर ही भटकता रहता है और जब तक ज्ञान को उसे पाने वाला मन नहीं मिल जाता तब तक वह ज्ञान Rachanaatmak (क्रिएटिव) नहीं बन पाता। अतः जब तक किसी मन में ज्ञान को पाने कि तीव्र इच्छा पैदा नहीं होती तब तक वह ज्ञान प्राप्त ही नहीं कर पाता और बिना ज्ञान के कोई भी मन रचनात्मक नहीं सोच पाता। और जब तक कोई मन रचनात्मक नहीं सोचने लगता, तब तक वह कोई महान काम नहीं कर सकता। इसलिए मन जितना ज्ञान पाता जाता है वह उतना ही रचनात्मक होता जाता है। और Rachanaatmak मन के रचनात्मक काम उसे महान बना देते हैं। आइये, इस बात को समझते हैं ज्ञान के प्यासे एक बच्चे की ज़िन्दगी से!

“बाबा, गांव के सब बच्चे पढ़ने जाते हैं, मुझे भी किताब दिला दो, मैं भी पढ़ने जाऊंगा।” पुत्र की बात सुनकर निर्धन असहाय पिता ने एक क्षण सोचने के बाद प्यार से बालक को गोद में उठा लिया और हंसते हुए निश्चयात्मक स्वर में कहा, “बेटा, मैं तुम्हें अवश्य पढ़ाऊंगा। तुम कल से विद्यालय जाना। “

गांव की प्राथमिक शिक्षा पूरी होते ही बालक ने आगे पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। पिता ने अपनी स्थिति का विचार न करते हुए आगे की पढ़ाई ले लिए उसे दूर नगर में ले जाना स्वीकार किया। पिता-पुत्र नगर की ओर चले। सड़क के किनारे मील के पत्थर को देखकर बालक ने आश्चर्य से पूछा, “बाबा, यह क्या है?”

किसान ने कहा, “बेटा, यह मील का पत्थर है। ” एक लंबी यात्रा तय करने के बाद भूखा-प्यासा थका किसान विश्राम के लिए छायादार वृक्ष के नीचे लेट गया और उसे लेटते ही नींद आ गई। किंतु ज्ञान पिपासु बालक को नींद कहां? बालक ने अपने फटे थैले से टूटी स्लेट निकाली और मील के पत्थर पर देखे हुए निशानों को स्लेट पर क्रम से अंकित करने लगा। नींद खुलने पर किसान ने देखा कि बालक ने स्लेट पर एक से नौ तक के अंग्रेजी के अंक शुद्ध और क्रमबद्ध लिखे हुए थे। कालांतर में यही बालक अपने उत्साह, लगन एवं परिश्रम से अनेक कष्टों के बीच नगर के चौराहों पर जलने वाले क्षीण प्रकाश में भी ज्ञान अर्जन करता रहा। किसी के लिए साधारण मजदूर-सा काम करने में भी नहीं झिझका और अंत में बना विद्यासागर-‘ईश्वर चंद्र विद्यासागर।’

केके
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