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मनोज्ञान – ‘मन का सैद्धान्तिक ज्ञान (Theoretical Knowledge) + मन का व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) + मन का रचनात्मक ज्ञान (Creative Knowledge) = ‘मनोज्ञान’ (Mind Education)!’ केके

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दार्शनिक विचारों वाली एक बुढ़िया एक बार अपने हाथ में पानी भरा मटका और दूसरे हाथ में जलती हुई मशाल लिए बहुत तेज़ कदमों से जा रही थी। उसका नाटकीय ढंग देखकर किसी ने पूछा, “पानी का मटका और जलती मशाल लेकर आप कहां दौड़ी जा रही हैं?” उसने अपनी अलमस्ती में जवाब दिया, “पानी का मटका नरक की आग बुझाने के लिए और मशाल स्वर्ग के सुखों को आग लगाने के लिए लेकर वहीं जा रही हूँ।” बुढ़िया का उत्तर जिज्ञासु की समझ में नहीं आया। उसने फिर प्रश्न किया, “मैं समझा नहीं। आपका अभिप्राय क्या है?” बुढ़िया समझाने लगी, “वास्तव में संसार के तमाम लोगों के मन और मस्तिष्क पर या तो स्वर्ग के सुखों की लालसा है या फिर नरक का भय सवार है। कोई स्वयं को समझने की साधना के मार्ग पर नहीं बढ़ रहा है। परन्तु मुझे लगता है कि यदि कोई अपने आपको समझने लगे तो वह इन दोनों से मुक्त हो सत्य को पहचान लेगा।”

आम तौर पर लोग सैद्धान्तिक (Theoretical) अथवा आदर्शात्मक (Ideal) बातें पढ़ते हैं, सुनते हैं और बोलते हैं। परन्तु ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम ही होती हैं जो उन सैद्धान्तिक अथवा आदर्शात्मक बातों को अपने व्यावहारिक जीवन में अपनाकर उन्हें व्यावहारिक तौर पर (Practically) अनुभव करते हैं। और सत्य यह है कि जब तक सैद्धान्तिक ज्ञान (Theoretical Knowledge) को अपने जीवन में उतार अनुभव नहीं किया जाता है तब तक व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) नहीं हो पाता है। लेकिन जो कोई सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यावहारिक तौर पर अपने जीवन में उतार लेता है उसे सैद्धान्तिक ज्ञान के साथ साथ व्यावहारिक ज्ञान भी हो जाता है। और ‘सैद्धान्तिक ज्ञान + व्यावहारिक ज्ञान’ के बिना रचनात्मक ज्ञान (Creative Knowledge) हो ही नहीं सकता। अतः रचनात्मक ज्ञान के लिए सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों का सम्मिश्रण अत्यावश्यक है। जब सैद्धान्तिक और व्यावहारिक ज्ञान होने पर रचनात्मक ज्ञान होने लगता है तब ही कोई स्वयं को समझने की साधना के मार्ग पर चलना शुरू कर पाता है। और जब तीनों का सम्मिश्रण हो जाता है तब ही मन का रचनात्मक ज्ञान ‘मनोज्ञान’ समझ आने लगता है।

केके
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